Follow by Email

Tuesday, September 24, 2013

Mystery of Thoughts ....!!!

Skipping Heart Beats
Every passing moment
Chasing the Life....
Mysteries of aftermath
Capturing the Existence
in quest of Survival....

Far away........
Up in the sky
Dreams are resting,
on the clouds
Twinkling stars
singing the Lullaby...!!

Archana ~ 24-09-2013

उड़ान

मुझे उड़ने के लिए
 पंख नहीं,
उड़ान चाहिए

मेरे शब्दों को
एक नयी
पहचान चाहिए

उड़ान जो अभी
भरी नहीं
शब्द जो अभी
कहे नही

ऊँची नीची पगडंडियों
को नापता मन
तत्पर है उड़ने को

अनकहे शब्दों में
अनछुए सपनो में 

दिए की लौ से
सूरज की किरणों तक
कुलाचे खाती उड़ान।

अर्चना ~ 23-09-2013

Sunday, September 22, 2013

I Exist !!!




I exist in your silent words,
I exist in my noisy silence,
I exist in Earth and skies,
I exist in many brain files !

I exist, you are far or near,
I exist, its blurred or clear,
I exist, in my Presence,
I exist in your Absence !

I exist in Summer,Autumn,Spring & Rain,
I exist in Anxiety,Love,Joys & Pain,
I exist in tear drops resting on cheeks,
I exist in smiles wonderful and sleek ! 

I exist, you accept or deny,
I exist to touch the sky,
I exist, you care or ignore,
I exist to seek and explore ! 

I am the wind, I blow at my pace,
I exist, not to win the race,
I exist and I remain,
For I exist to sustain !!

Archana ~ 22-09-2013

Thursday, September 19, 2013

मम्मी की डायरी से ......



जिस वक़्त मम्मी की मृत्यु हुयी, उस वक़्त इतनी समझ नहीं थी की उनकी चीज़ों को ठीक से संभाल पाती। अब समझ आयी है तो काफ़ी कुछ पीछे छूट चुका है, फिर भी कुछ अवशेष हैं जो उनके आस पास होने का अहसास दिलाते हैं। जैसे कि उनकी ये लाल डायरी, जो डायरी कम और पिटारा ज्यादा है। भजन, नीति वचन, फ़ोन नम्बर्स, तरह तरह के पकवान,अचार और मुरब्बे  बनाने की विधियाँ, कवितायें, पते और भी न जाने क्या क्या.........।


जब मैं  हाई स्कूल में थी तो English Poetry की  जिस कविता  ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया था वह थी "IF" by "Rudyard Kipling". एक दिन मम्मी की डायरी उलटते-पलटते समय नज़र पड़ी एक कविता पर, ज़रा ध्यान दिया तो पाया यह कविता तो "IF" का हिंदी अनुवाद थी। मेरा गुस्सा और संवेदनशीलता मम्मी पर गया है यह तो मुझे लगभग यकीन ही था पर मेरी कुछ साहित्यिक पसंद  मम्मी की पसंद से मेल खाती है यह जान कर मुझे एक विचित्र सी अनुभूति हुयी।

यह तो नहीं कह सकती कि "IF" का यह अनुवाद मम्मी ने ही किया होगा , हो सकता है उन्होंने किया हो और हो सकता है नहीं किया हो। मेरा इस सम्बन्ध में कुछ भी कह पाना मुश्किल होगा और अब उनकी अनुपस्थिति में पता भी नहीं लगाया जा सकता। पर आप सभी के साथ वह कविता बाँटना अवश्य चाहूँगी।
                                         

               यदि   

यदि संतुलन खो रहे हों सब जब, 
और दोष मढ़ रहे हों तुम पर, 
रख सको तब भी तुम अपने आपको संतुलित ;

यदि सब देख रहे हों जब संदेह दृष्टि से तुम्हें, 
विश्वास कर सको अपने पर तब भी तुम 
और दे सको सम्मान उनके संदेह को भी ; 

यदि कर सको प्रतीक्षा और कभी थको नहीं प्रतीक्षा से तुम,
अथवा फैलाया जा रहा हो जब झूठ तुम्हारे प्रति 
प्रवत्त न होओ तब भी तुम झूठ में ; 

यदि जब घृणा कर रहे हों सब तुमसे, 
दूर रख सको घृणा को हृदय से तब भी तुम,
और फिर भी न दिखो बहुत अच्छे, 
न बोलो बुद्धिमानों की भाषा ही; 

यदि स्वप्न तो लो तुम, 
स्वप्न से संचालित न होने दो निज जीवन को,
यदि आश्रय तो लो तुम विचार का, 
पर बनने  न पाए विचार तुम्हारा सर्वस्व; 

यदि भेंट हो तुम्हारी विजय और विनाश दोनों से, 
हो व्यवहार सम तुम्हारा परन्तु,
इन दोनों छलियों के प्रति; 

यदि तुम सहन कर सको उस सत्य को, 
जो किया जा रहा है पेश तोड़ मरोड़ कर तुम्हारे प्रति,
और जो बिछाया गया जाल है मूर्खों के लिए ;  

यदि वस्तुओं को तुम जिन्हें गढ़ा स्वयं तुमने अपने हाथों से, 
देख सको टूटा हुआ निज नेत्रों के सामने, और ,
जुट सको दोबारा नव निर्माण में नत मस्तक हुए ; 

यदि बना सको एक ढेरी, अपनी आज तक की सफलताओं की,
और दाव पर लगा सको उन्हें किसी एक सिद्धांत पर,
और हार जाओ सब कुछ पास था तुम्हारे जो कुछ भी, 
और कर सको प्रारंभ नए सिरे से अपने जीवन  को,
ना निकले आह एक भी अंतर से आघात पाकर ; 

यदि कर्त्तव्य के मार्ग पर अपने हृदय, नस, नाड़ी को, 
जब जवाब दे चुके हों वे, प्रवृत्त कर सको कर्म में, 
और तुम डटे रहो जब तक कि तुम में बचा न हो कुछ भी, 
सिवाय एक संकल्प के जो कहे तुम्हें "डटे रहो" ; 

यदि मिलो तुम भीड़ से और अडिग रहो निज सिद्धांत पर, 
यदि चलो तुम राजाओं के साथ, पर 
पृथक न करो सामान्य जन से अपने आप को; 

यदि शत्रु और प्रियजन आघात न पहुंचा सके तुम्हें, 
सब महत्वपूर्ण हों पर अति-महत्वपूर्ण न हो कोई तुम्हारे लिये;

यदि क्षमा का प्याला भर चूका हो जब 
संभाल सको कुछ पल के लिए अपने आपको, 
भूमंडल यह और यहाँ जो कुछ भी है तुम्हारा होगा, 

   और सबसे अधिक 

मेरे बच्चे ! इंसान बन जाओगे तुम, इंसान बन जाओगे तुम !!



~ मम्मी की डायरी से ( IF by Rudyard Kipling का हिंदी अनुवाद ) 









Saturday, September 14, 2013

बुढ़ापे का सहारा ...

आज Children's Home की एक बच्ची को नज़दीक के सरकारी अस्पताल ले कर गयी थी। दिन के करीब 11 बजे होंगे मैं Eye OPD के बाहर बैठे मिन्नी का इंतज़ार कर रही थी, अन्दर उसके कुछ टेस्ट हो रहे थे। तरह तरह के मरीज़, जिनमे से 50% वृद्ध ही होंगे सबके साथ कोई न कोई था सिवाय एक बूढ़ी अम्मा के। एकदम पतली दुबली, जैसे किसी ने कंकाल पर खाल चढ़ा दी हो। OPD में पड़ी बैंचे भरी हुयी थीं पर  इतनी भी नहीं की किसी को नीचे बैठना पड़े।  ना जाने क्यूँ वो अम्मा नीचे ज़मीन पर एक बैंच का सहारा लिए बैठी हुयी थी। मैं  चुप चाप बैठे हुए उन्हें देख रही थी और अम्मा को इस बात का अंदाजा भी न था।

थोड़ी देर में मिन्नी टेस्टिंग रूम से बहार आई और मेरा ध्यान कुछ पलों के लिए उस बूढ़ी अम्मा से हट गया।  मिन्नी का एक टेस्ट अभी और होना था,  जिसके लिए नर्स ने उसकी आँखों में दवाई डाल के बैठा दिया था। मिन्नी आँखें दवाई डलवा कर आँखें बंद करके बैठ गयी और मेरा ध्यान फिर उसी बूढी अम्मा पर चला गया।  नर्स उनको भी आँखों में दवाई डाल रही थी और सहारा दे कर उन्हें ऊपर बैठाने की कोश्शि भी कर रही थी।  अम्मा का रंग गोरा था और चहरे की झुर्रियां ये साफ़ बता रही थीं की अपने ज़माने में खूब सुन्दर रही होंगी। सूखी सी काया सूती साडी में लिपटी हुयी थी और ब्लाउज पर कई पैबंद लगे थे। नर्स से आँखों में दवाई डलवाकर अम्मा इत्मीनान से कुर्सी पर कमर टिका कर बैठ गयीं, आँखें बंद थीं और  हाथों के बीच दबा था एक छोटा सा कपडे का थेला, जिसमें से एक छोटी सी पानी की बोतल बाहर झाँक रही थी।

लगभग आधे घंटे के बाद मिन्नी और अम्मा दोनों एक एक करके दोबारा टेस्टिंग के लिए अन्दर गए और फिर बाहर आ कर डॉक्टर को रिपोर्ट्स दिखाने की प्रतीक्षा करने लगे। मिन्नी मेरे कंधे पर सर रख कर सो रही थी और मैं ना जाने क्यूँ उस बूढी अम्मा के बारे में सोच रही थी, "कौन है ? अकेली क्यूँ आई हैं? कहाँ  रहती हैं?" बहुत कुछ चल रहा था मन में।  भीड़ काफी थी, मैंने भी कुछ देर के लिए आँखें बंद कर लीं और मिन्नी के सर पर अपना सर टिका दिया। मुश्किल से पाँच मिनट हुए होंगे मुझे आँख बंद किये हुए की किसी ने मुझे धीरे से थप-थपाया, आंख खुली तो देखा कि वो ही दुबली पतली अम्मा मेरे बराबर में बैठी मुझे उठाने कि कोशिश कर रही थी।

अजीब इत्तेफ़ाक था भीड़ से खचाखच भरे उस कमरे में, अम्मा इतनी दूर से उठकर सिर्फ मेरे ही पास आई थीं।  उन्हें कुछ पूछना भी था तो अपने बराबर वाले से पूछ लेतीं, इतनी दूर मेरे पास आने की क्या ज़रुरत थी भला? मैं हतप्रद थी कि बिना मेरे कहे अम्मा ने मेरे मन को कैसे पढ़ लिया? कैसे जान लिया उन्होंने कि जबसे वो इस कमरे आयीं हैं , मेरी आँखें भले ही कहीं हों पर मेरा ध्यान उन्ही पर है।  अपने झुर्री से भरे हाथों को मेरे हाथों पर रखते हुए बोलीं "बेटा और कितना समय लगेगा ? अब नहीं बैठा जा रहा। " भीड़ सच में बहुत थी, मैंने उनको सांत्वना दी और नर्स से निवेदन किया की कृपया उनको जल्दी दिखवा दें।

अम्मा मेरे ही बराबर में बैठ अपनी बारी प्रतीक्षा करने लगीं। मुझसे रहा नहीं गया, पूछ ही बैठी "अम्मा आप अकेली आई हो ? कोई साथ नहीं आया आपके ?" अम्मा की आँखें लगभग भर आयीं, मुझे लगा मैं यह सवाल पूछकर सच में कोई बहुत बड़ी गलती कर बैठी हूँ। अम्मा थोडा नियंत्रित होते हुए बोलीं "बेटा ड्यूटी पर गया है, और दोनों पोते भी अपनी अपनी कम्पनियों में व्यस्त हैं। बस ज़रा आँख दिखानी थी तो मैं चली आई खुद ही।" मेरा गला भर आया था, और कुछ आगे पूछने की हिम्मत ही नहीं हुयी।

दो मिनट को अम्मा और मैं दोनों चुप हो गए। अम्मा ने खुद ही चुप्पी को तोड़ा और बताने लगीं, "एक बेटा दिल्ली से बाहर है  और जो दिल्ली में रहता है उसको काम से फुर्सत ही कहाँ। माँ के साथ अस्पताल आएगा तो काम और रूपये दोनों का हर्जा होगा। दोनों पोते भी सुबह चले जाते हैं तो फिर रात को ही लौट कर आते हैं। बहु ने चलते वक़्त 10 रूपये दिए थे, समझ नहीं आया इनसे दो केले खरीद लूं कि रिक्शा कर लूं ? बेटे वो तो एक रिक्शावाला पडौस में ही रहता था कि बिना पैसे लिए मुझे यहाँ तक ले आया, तो मैंने दो केले खरीद ही लिए।  अब पूरे दिन अस्पताल में ना जाने कितना समय लग जाता, इन दो केलों ने बड़ा सहारा दिया। पर अब वापस जाने के लिए रिक्शे के पैसे फिर नहीं हैं.…  "

अम्मा बताये जा रही थी और मैं कुछ दुःख, कुछ गुस्से में सब चुप चाप सुन रही थी। 70 साल की अम्मा कमजोरी से 85 की प्रतीत होती थी। दो दो कमाऊ बेटे, पोते, और बहुओं से भरा पूरा परिवार होने के बावजूद उम्र के  इस दौर में क्षीर्ण होती काया का बोझ अम्मा बिलकुल अकेले ढो रहीं थीं। मेरा मन द्रवित था, क्या यही दिन देखने के लिए समाज शादी करने और बच्चे पैदा करने के उल्हाने देता है। कम से कम जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ तो शादी बुढ़ापे के सहारे के लिए ही की जाती है, न करो तो 100 दलीलें दे डालतें हैं अकेलेपन से जुड़ी परेशानियों की। ये समाज और इसकी निर्मूल परम्पराएं !

कितनी भ्रांतियाँ हैं हमारे इर्द गिर्द और इनके चक्रव्यूह में घिरे हम। संवेदनशीलता व्यक्ति के स्तर की गुलाम नहीं होती , फिर चाहे  वह स्तर सामाजिक हो, आर्थिक हो अथवा वैवाहिक। हाथ बढ़ा कर छूने भर की देर है , खुशियाँ हमारे आस पास ही हैं कहीं। वृद्ध आश्रम में रह रहे वृद्ध जिन्होंने कभी विवाह नहीं किया शायद अस्पताल में मिली इस बूढ़ी अम्मा से ज्यादा खुश हों, उन्हें इस बात की तकलीफ तो न होगी की जिनको पालने पोसने में हाड़-मांस एक कर दिया, ढलती उम्र में वोही बच्चे बेसहारा छोड़  देते हैं।

अम्मा डॉक्टर को अपनी आँख दिखाकर जा रही थी, पहली बार उनको चलते हुए देखा। उनका ढलता बूढ़ा शरीर कमजोरी से झुक गया था। उनके बेजान और शिथिल बढ़ते कदम जीवन की वास्तविकता का अहसास करा रहे थे और घटती संवेदनशीलता का भी.………… ।

अर्चना ~ 11-09-2013

Tuesday, September 10, 2013

दस ग्राम शान्ति....!!!



एक शोर , हर ओर .....
सन्नाटा भीड़ में ,
दब गया है कहीं।
आज-कल,
ख़ामोशी भी चीखती है ....
दस ग्राम शान्ति,
सोने के भाव मिलती है।

अर्चना ~ 09-09-2013

Friday, September 6, 2013

Happy Teachers Day Ma'am....!!

I started my career as Assistant professor in Allahabad Agriculture Institute Deemed University in 2002. (Now its Sam Higginbotom Institute of Agriculture and Sciences).

It was fun teaching and those were one the best days of my professional life. More than 50% friends in my Face Book profile are my students I have taught in Allahabad and Pilani. In today's fast forward life we hardly get time to interact with each other but my students still make sure that they wish me on Teachers Day.

Today too I got lots of Teachers Day wishes and messages, via sms, calls, mails, twitter and FB. I felt good reading every wish. It is my earning over these many years. Wishes are always good and no wish can replace other wish but still one wish and message touched me inside. I am sharing that  with you. It was the message from a student who silently admired but could never interact with me for she was reserve and shy.

I actually felt corners of my eyes were wet while reading this message from Manisha:


"Happy teachers day ma'am...!
aapko ek baat batati hu jo pehle main sirf apne frnds ke saath share karti thi. College ka 1st day 1st lecture mera aapke saath hi tha....And u were amazing....Aap mujhe bahut acchi lagi...Sab aapse baat karte the par main kafi shy thi to aapse kabhi personally baat nai ho paayi....

Surely aap mujhe nai recognise kar paaoge. jab aap aaidu se ja rahi thi to mujhe kafi bura laga tha.... 
Life me kai teachers ke saath interaction hua par aap sabse acche lage"

I could not say directly anything to her but in my heart I silently told her:

"Manisha I am really sorry that I am not able to recognize you exactly the way I recognize my students. Reading your message I am realizing that somewhere I too could not play my teacher's role effectively. Though I tired my level best to connect every student of my class, don't know how did I ignore you, though it was not at all intentional.I left Allahabad and you are conveying me today, but its never too late for reviving the connections. You told me that you are in Delhi, sure we will meet to rejuvenate good old days.Lots of love and blessings to you today and always !!"

Archana ~ 05-09-2013

Sunday, September 1, 2013

चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय.....!

चलो एक इतवार पुराना मनाया जाए,
गुज़रे बचपन को फिर से बुलाया जाए।

महाभारत का "समय" और मोगली का "जंगल",
"ये जो है ज़िन्दगी" का वही "खट्टा-मीठा' सफ़र ।
"नीम के पेड़" की छाँव में भागते "विक्रम-बेताल",
'सुरभी" से खिलती सुबह और 'चित्रहार" कमाल।

क्रूर सिंह की "यक्कू"  से कांपती 'चन्द्रकान्ता',
"पोटली बाबा की" और "चाणक्य" की दक्षता।
"ज़बान संभाल' के जाना ज़रा "नुक्कड़" पर,
"स्पेस सिटी सिग्मा" की है तुम पर नज़र।

सबकी सीडी-यों को एक-एक कर चलाया जाए
चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय।

नंदन, चम्पक, बिल्लू, पिंकी, चंदामामा,
नागराज, पराग और चाचा चौधरी का हंगामा।
कम्पुटर नहीं, कम्पुटर से तेज़ दिमाग को देखा था,
हमने बचपन में साबू से कमाल को देखा था।

जिसे जो कुछ मिले वो सब ले आना,
कुछ पलों के लिए बचपन से क्या शर्माना।
देखते ही सबकी बाछें  खिल जायेंगीं,
किताबों की वो अदला बदली याद बड़ी आएगी।

देखना कि  कुछ भी छूटने ना पाए।
चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय।

चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय।

अर्चना ~ 01-09-013