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Monday, January 27, 2014

सर्दियों की शाम .....

सर्दियों की शाम जमा देती है,
खून, रूह और सोच को भी...
कोहरे से जंग लड़ती ठंडी आखें
जाने क्या ढूंढने को आमादा हैं,
काँपते होंठ और पथराये हाथ
ठण्ड कुछ ज्यादा है.....!

दूर उस बस्ती में उगा सूरज
काश, यूँही पिघला देता मुझे,
शाम के इस सिरे से.…
भोर के उस सिरे तक,
मैंने खुद को बाँध लिया है,
उन्मादित किरणों के मोहपाश में....!


अर्चना ~ 27-01-2014

मुझे पंख दे दो !

उस पार .......
है सतरंगी आसमान
मेरी कल्पनाओं की पहचान
मैं जाऊँगी उड़ते-उड़ते
पेड़, पहाड़ी, ताल नापते
मुझे पंख दे दो !!


अर्चना ~ 27-01-2014

Saturday, January 4, 2014

सुबह फिर सपने पुराने आये …… !!

सुबह फिर सपने पुराने आये,
मेरी हैरानी को बढ़ाने आये ....  
वक़्त जिन्हें पीछे छोड़ आया 
मुझे वही चेहरे डराने आये ....

आँखें खुलीं तो मन उलझा था,
बैचेनी सोचे सच क्या था .... 
पलकों के पीछे की दुनियाँ पे
रौशनी का  परदा था …… 

बंद आँखों की दुनियाँ भी अजीब होती है 
दूर जितनी , उतनी ही करीब होती है ...
रौशनी में झाँकते, अंधेरों  के  साये 
सपने पुराने,  ख़याल नए लाये  .... !  

सुबह फिर सपने पुराने आये  …… !


अर्चना ~ 03-01-2014