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Tuesday, September 29, 2015

तुम और मैं ..... !!

तुम गति
मैं धारा
तुम बहाव
मैं किनारा
तुम अनंत
मैं क्षितिज
तुम अथाह
मैं विदित
आकर्षण निश्चित है
और संघर्ष भी .......

~ अर्चना
28 - 09 - 2015





Saturday, September 26, 2015

बस वो एक पल .... !!

ऋतु अधीर है मन चंचल है एक हलचल मर्यादा के अंतःकरण में एक भगदड़ तन के कण कण में विस्मित आँखें मौन से झाँके हो जाता कुछ भी एक पल में 

~ अर्चना
26-09-2015

मैं..!

विस्मित हूँ मैं
हर पल की रची
एक नयी रचना
को देख
कितनी बदल गयी
हूँ मैं
हर अगले पल
हो जाती हूँ
कुछ और बेहतर
कुछ और विशेष 

~ अर्चना
26 - 09- 2015

Saturday, September 12, 2015

तुम...!

तुम्हें स्थापित कर लिया है,
मन में,अंत:करन में..
तुम्हारी अनुपस्थिति अब,
 विचलित नहीं करती,
 तन की नश्वरता अब,
चिंतित नहीं करती...!


~ अर्चना
11-09-2015

जब रात...!

जब रात आँखों में टिमटिमाती है
और मैं बहने लगती हूँ नदी सी
आँखों के संकरे कोनो से
मुझमें डुबकियाँ लगाते चाँद-तारे
थोड़ा और निखर जाते हैं!

~ अर्चना
12-09-2015