Saturday, December 21, 2013

Do they care actually..... ?

When you get
a surprised attention,
a touch of concern
from those abusive
tongues and
indifferent eyes....

You get lost in
the blank spaces of horizon
They are the one
who walked away,
They are the one
who closed all the doors...

Then they appear
suddenly, calmly..
and leave you confused
with the baffled warmth
you ask yourself carefully...
Do they care actually.....?

Archana ~
21-12-2013

Monday, December 2, 2013

Trap...!!

A secure feeling 
of being insecure, 
Silence of a death 
in the noises around

Hearing own heart-beats 
and deaf to the world. 
Dancing on fortune
on clueless tune...
carelessly, fearlessly, aimlessly.

Passing moments, 
creating the emptiness,
Nothing more, 
nothing less.....

Everything is new, 
in the trap of old. 
A hot shattered life, 
experiencing the cold...... 

Archana ~ 02-12-2013 

Words ..... !!!

Words that were said.
Words that were framed.
Words that trapped your heart.
Words that were too smart.
Now left you empty, teared you apart.

Words then created mystic illusions.
Words now cleared all confusions.
Words then smoothed all the pain
Words now don't sound the same
Then bridged the gap, now a tight slap.

Words were then and words are now
Removing all the doubts, somehow......
Transition, transformation, sublimation
Creation, connection, destruction...
Words on move, striving high for Liberation.

Archana ~ 01-12-2013 

Tuesday, September 24, 2013

Mystery of Thoughts ....!!!

Skipping Heart Beats
Every passing moment
Chasing the Life....
Mysteries of aftermath
Capturing the Existence
in quest of Survival....

Far away........
Up in the sky
Dreams are resting,
on the clouds
Twinkling stars
singing the Lullaby...!!

Archana ~ 24-09-2013

उड़ान

मुझे उड़ने के लिए
 पंख नहीं,
उड़ान चाहिए

मेरे शब्दों को
एक नयी
पहचान चाहिए

उड़ान जो अभी
भरी नहीं
शब्द जो अभी
कहे नही

ऊँची नीची पगडंडियों
को नापता मन
तत्पर है उड़ने को

अनकहे शब्दों में
अनछुए सपनो में 

दिए की लौ से
सूरज की किरणों तक
कुलाचे खाती उड़ान।

अर्चना ~ 23-09-2013

Sunday, September 22, 2013

I Exist !!!




I exist in your silent words,
I exist in my noisy silence,
I exist in Earth and skies,
I exist in many brain files !

I exist, you are far or near,
I exist, its blurred or clear,
I exist, in my Presence,
I exist in your Absence !

I exist in Summer,Autumn,Spring & Rain,
I exist in Anxiety,Love,Joys & Pain,
I exist in tear drops resting on cheeks,
I exist in smiles wonderful and sleek ! 

I exist, you accept or deny,
I exist to touch the sky,
I exist, you care or ignore,
I exist to seek and explore ! 

I am the wind, I blow at my pace,
I exist, not to win the race,
I exist and I remain,
For I exist to sustain !!

Archana ~ 22-09-2013

Thursday, September 19, 2013

मम्मी की डायरी से ......



जिस वक़्त मम्मी की मृत्यु हुयी, उस वक़्त इतनी समझ नहीं थी की उनकी चीज़ों को ठीक से संभाल पाती। अब समझ आयी है तो काफ़ी कुछ पीछे छूट चुका है, फिर भी कुछ अवशेष हैं जो उनके आस पास होने का अहसास दिलाते हैं। जैसे कि उनकी ये लाल डायरी, जो डायरी कम और पिटारा ज्यादा है। भजन, नीति वचन, फ़ोन नम्बर्स, तरह तरह के पकवान,अचार और मुरब्बे  बनाने की विधियाँ, कवितायें, पते और भी न जाने क्या क्या.........।


जब मैं  हाई स्कूल में थी तो English Poetry की  जिस कविता  ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया था वह थी "IF" by "Rudyard Kipling". एक दिन मम्मी की डायरी उलटते-पलटते समय नज़र पड़ी एक कविता पर, ज़रा ध्यान दिया तो पाया यह कविता तो "IF" का हिंदी अनुवाद थी।  मेरी संवेदनशीलता तो मम्मी पर गयी है यह तो मुझे लगभग यकीन ही था पर मेरी कुछ साहित्यिक पसंद  मम्मी की पसंद से मेल खाती है यह जान कर मुझे एक विचित्र सी अनुभूति हुयी।

यह तो नहीं कह सकती कि "IF" का यह अनुवाद मम्मी ने ही किया होगा , हो सकता है उन्होंने किया हो और हो सकता है नहीं किया हो। मेरा इस सम्बन्ध में कुछ भी कह पाना मुश्किल होगा और अब उनकी अनुपस्थिति में पता भी नहीं लगाया जा सकता। पर आप सभी के साथ वह कविता बाँटना अवश्य चाहूँगी।
                                         

               यदि   

यदि संतुलन खो रहे हों सब जब, 
और दोष मढ़ रहे हों तुम पर, 
रख सको तब भी तुम अपने आपको संतुलित ;

यदि सब देख रहे हों जब संदेह दृष्टि से तुम्हें, 
विश्वास कर सको अपने पर तब भी तुम 
और दे सको सम्मान उनके संदेह को भी ; 

यदि कर सको प्रतीक्षा और कभी थको नहीं प्रतीक्षा से तुम,
अथवा फैलाया जा रहा हो जब झूठ तुम्हारे प्रति 
प्रवत्त न होओ तब भी तुम झूठ में ; 

यदि जब घृणा कर रहे हों सब तुमसे, 
दूर रख सको घृणा को हृदय से तब भी तुम,
और फिर भी न दिखो बहुत अच्छे, 
न बोलो बुद्धिमानों की भाषा ही; 

यदि स्वप्न तो लो तुम, 
स्वप्न से संचालित न होने दो निज जीवन को,
यदि आश्रय तो लो तुम विचार का, 
पर बनने  न पाए विचार तुम्हारा सर्वस्व; 

यदि भेंट हो तुम्हारी विजय और विनाश दोनों से, 
हो व्यवहार सम तुम्हारा परन्तु,
इन दोनों छलियों के प्रति; 

यदि तुम सहन कर सको उस सत्य को, 
जो किया जा रहा है पेश तोड़ मरोड़ कर तुम्हारे प्रति,
और जो बिछाया गया जाल है मूर्खों के लिए ;  

यदि वस्तुओं को तुम जिन्हें गढ़ा स्वयं तुमने अपने हाथों से, 
देख सको टूटा हुआ निज नेत्रों के सामने, और ,
जुट सको दोबारा नव निर्माण में नत मस्तक हुए ; 

यदि बना सको एक ढेरी, अपनी आज तक की सफलताओं की,
और दाव पर लगा सको उन्हें किसी एक सिद्धांत पर,
और हार जाओ सब कुछ पास था तुम्हारे जो कुछ भी, 
और कर सको प्रारंभ नए सिरे से अपने जीवन  को,
ना निकले आह एक भी अंतर से आघात पाकर ; 

यदि कर्त्तव्य के मार्ग पर अपने हृदय, नस, नाड़ी को, 
जब जवाब दे चुके हों वे, प्रवृत्त कर सको कर्म में, 
और तुम डटे रहो जब तक कि तुम में बचा न हो कुछ भी, 
सिवाय एक संकल्प के जो कहे तुम्हें "डटे रहो" ; 

यदि मिलो तुम भीड़ से और अडिग रहो निज सिद्धांत पर, 
यदि चलो तुम राजाओं के साथ, पर 
पृथक न करो सामान्य जन से अपने आप को; 

यदि शत्रु और प्रियजन आघात न पहुंचा सके तुम्हें, 
सब महत्वपूर्ण हों पर अति-महत्वपूर्ण न हो कोई तुम्हारे लिये;

यदि क्षमा का प्याला भर चूका हो जब 
संभाल सको कुछ पल के लिए अपने आपको, 
भूमंडल यह और यहाँ जो कुछ भी है तुम्हारा होगा, 

   और सबसे अधिक 

मेरे बच्चे ! इंसान बन जाओगे तुम, इंसान बन जाओगे तुम !!



~ मम्मी की डायरी से ( IF by Rudyard Kipling का हिंदी अनुवाद ) 









Saturday, September 14, 2013

बुढ़ापे का सहारा ...

आज Children's Home की एक बच्ची को नज़दीक के सरकारी अस्पताल ले कर गयी थी। दिन के करीब 11 बजे होंगे मैं Eye OPD के बाहर बैठे मिन्नी का इंतज़ार कर रही थी, अन्दर उसके कुछ टेस्ट हो रहे थे। तरह तरह के मरीज़, जिनमे से 50% वृद्ध ही होंगे सबके साथ कोई न कोई था सिवाय एक बूढ़ी अम्मा के। एकदम पतली दुबली, जैसे किसी ने कंकाल पर खाल चढ़ा दी हो। OPD में पड़ी बैंचे भरी हुयी थीं पर  इतनी भी नहीं की किसी को नीचे बैठना पड़े।  ना जाने क्यूँ वो अम्मा नीचे ज़मीन पर एक बैंच का सहारा लिए बैठी हुयी थी। मैं  चुप चाप बैठे हुए उन्हें देख रही थी और अम्मा को इस बात का अंदाजा भी न था।

थोड़ी देर में मिन्नी टेस्टिंग रूम से बहार आई और मेरा ध्यान कुछ पलों के लिए उस बूढ़ी अम्मा से हट गया।  मिन्नी का एक टेस्ट अभी और होना था,  जिसके लिए नर्स ने उसकी आँखों में दवाई डाल के बैठा दिया था। मिन्नी आँखें दवाई डलवा कर आँखें बंद करके बैठ गयी और मेरा ध्यान फिर उसी बूढी अम्मा पर चला गया।  नर्स उनको भी आँखों में दवाई डाल रही थी और सहारा दे कर उन्हें ऊपर बैठाने की कोश्शि भी कर रही थी।  अम्मा का रंग गोरा था और चहरे की झुर्रियां ये साफ़ बता रही थीं की अपने ज़माने में खूब सुन्दर रही होंगी। सूखी सी काया सूती साडी में लिपटी हुयी थी और ब्लाउज पर कई पैबंद लगे थे। नर्स से आँखों में दवाई डलवाकर अम्मा इत्मीनान से कुर्सी पर कमर टिका कर बैठ गयीं, आँखें बंद थीं और  हाथों के बीच दबा था एक छोटा सा कपडे का थेला, जिसमें से एक छोटी सी पानी की बोतल बाहर झाँक रही थी।

लगभग आधे घंटे के बाद मिन्नी और अम्मा दोनों एक एक करके दोबारा टेस्टिंग के लिए अन्दर गए और फिर बाहर आ कर डॉक्टर को रिपोर्ट्स दिखाने की प्रतीक्षा करने लगे। मिन्नी मेरे कंधे पर सर रख कर सो रही थी और मैं ना जाने क्यूँ उस बूढी अम्मा के बारे में सोच रही थी, "कौन है ? अकेली क्यूँ आई हैं? कहाँ  रहती हैं?" बहुत कुछ चल रहा था मन में।  भीड़ काफी थी, मैंने भी कुछ देर के लिए आँखें बंद कर लीं और मिन्नी के सर पर अपना सर टिका दिया। मुश्किल से पाँच मिनट हुए होंगे मुझे आँख बंद किये हुए की किसी ने मुझे धीरे से थप-थपाया, आंख खुली तो देखा कि वो ही दुबली पतली अम्मा मेरे बराबर में बैठी मुझे उठाने कि कोशिश कर रही थी।

अजीब इत्तेफ़ाक था भीड़ से खचाखच भरे उस कमरे में, अम्मा इतनी दूर से उठकर सिर्फ मेरे ही पास आई थीं।  उन्हें कुछ पूछना भी था तो अपने बराबर वाले से पूछ लेतीं, इतनी दूर मेरे पास आने की क्या ज़रुरत थी भला? मैं हतप्रद थी कि बिना मेरे कहे अम्मा ने मेरे मन को कैसे पढ़ लिया? कैसे जान लिया उन्होंने कि जबसे वो इस कमरे आयीं हैं , मेरी आँखें भले ही कहीं हों पर मेरा ध्यान उन्ही पर है।  अपने झुर्री से भरे हाथों को मेरे हाथों पर रखते हुए बोलीं "बेटा और कितना समय लगेगा ? अब नहीं बैठा जा रहा। " भीड़ सच में बहुत थी, मैंने उनको सांत्वना दी और नर्स से निवेदन किया की कृपया उनको जल्दी दिखवा दें।

अम्मा मेरे ही बराबर में बैठ अपनी बारी प्रतीक्षा करने लगीं। मुझसे रहा नहीं गया, पूछ ही बैठी "अम्मा आप अकेली आई हो ? कोई साथ नहीं आया आपके ?" अम्मा की आँखें लगभग भर आयीं, मुझे लगा मैं यह सवाल पूछकर सच में कोई बहुत बड़ी गलती कर बैठी हूँ। अम्मा थोडा नियंत्रित होते हुए बोलीं "बेटा ड्यूटी पर गया है, और दोनों पोते भी अपनी अपनी कम्पनियों में व्यस्त हैं। बस ज़रा आँख दिखानी थी तो मैं चली आई खुद ही।" मेरा गला भर आया था, और कुछ आगे पूछने की हिम्मत ही नहीं हुयी।

दो मिनट को अम्मा और मैं दोनों चुप हो गए। अम्मा ने खुद ही चुप्पी को तोड़ा और बताने लगीं, "एक बेटा दिल्ली से बाहर है  और जो दिल्ली में रहता है उसको काम से फुर्सत ही कहाँ। माँ के साथ अस्पताल आएगा तो काम और रूपये दोनों का हर्जा होगा। दोनों पोते भी सुबह चले जाते हैं तो फिर रात को ही लौट कर आते हैं। बहु ने चलते वक़्त 10 रूपये दिए थे, समझ नहीं आया इनसे दो केले खरीद लूं कि रिक्शा कर लूं ? बेटे वो तो एक रिक्शावाला पडौस में ही रहता था कि बिना पैसे लिए मुझे यहाँ तक ले आया, तो मैंने दो केले खरीद ही लिए।  अब पूरे दिन अस्पताल में ना जाने कितना समय लग जाता, इन दो केलों ने बड़ा सहारा दिया। पर अब वापस जाने के लिए रिक्शे के पैसे फिर नहीं हैं.…  "

अम्मा बताये जा रही थी और मैं कुछ दुःख, कुछ गुस्से में सब चुप चाप सुन रही थी। 70 साल की अम्मा कमजोरी से 85 की प्रतीत होती थी। दो दो कमाऊ बेटे, पोते, और बहुओं से भरा पूरा परिवार होने के बावजूद उम्र के  इस दौर में क्षीर्ण होती काया का बोझ अम्मा बिलकुल अकेले ढो रहीं थीं। मेरा मन द्रवित था, क्या यही दिन देखने के लिए समाज शादी करने और बच्चे पैदा करने के उल्हाने देता है। कम से कम जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ तो शादी बुढ़ापे के सहारे के लिए ही की जाती है, न करो तो 100 दलीलें दे डालतें हैं अकेलेपन से जुड़ी परेशानियों की। ये समाज और इसकी निर्मूल परम्पराएं !

कितनी भ्रांतियाँ हैं हमारे इर्द गिर्द और इनके चक्रव्यूह में घिरे हम। संवेदनशीलता व्यक्ति के स्तर की गुलाम नहीं होती , फिर चाहे  वह स्तर सामाजिक हो, आर्थिक हो अथवा वैवाहिक। हाथ बढ़ा कर छूने भर की देर है , खुशियाँ हमारे आस पास ही हैं कहीं। वृद्ध आश्रम में रह रहे वृद्ध जिन्होंने कभी विवाह नहीं किया शायद अस्पताल में मिली इस बूढ़ी अम्मा से ज्यादा खुश हों, उन्हें इस बात की तकलीफ तो न होगी की जिनको पालने पोसने में हाड़-मांस एक कर दिया, ढलती उम्र में वोही बच्चे बेसहारा छोड़  देते हैं।

अम्मा डॉक्टर को अपनी आँख दिखाकर जा रही थी, पहली बार उनको चलते हुए देखा। उनका ढलता बूढ़ा शरीर कमजोरी से झुक गया था। उनके बेजान और शिथिल बढ़ते कदम जीवन की वास्तविकता का अहसास करा रहे थे और घटती संवेदनशीलता का भी.………… ।

अर्चना ~ 14-09-2013

Tuesday, September 10, 2013

दस ग्राम शान्ति....!!!



एक शोर , हर ओर .....
सन्नाटा भीड़ में ,
दब गया है कहीं।
आज-कल,
ख़ामोशी भी चीखती है ....
दस ग्राम शान्ति,
सोने के भाव मिलती है।

अर्चना ~ 09-09-2013

Friday, September 6, 2013

Happy Teachers Day Ma'am....!!

I started my career as Assistant professor in Allahabad Agriculture Institute Deemed University in 2002. (Now its Sam Higginbotom Institute of Agriculture and Sciences).

It was fun teaching and those were one the best days of my professional life. More than 50% friends in my Face Book profile are my students I have taught in Allahabad and Pilani. In today's fast forward life we hardly get time to interact with each other but my students still make sure that they wish me on Teachers Day.

Today too I got lots of Teachers Day wishes and messages, via sms, calls, mails, twitter and FB. I felt good reading every wish. It is my earning over these many years. Wishes are always good and no wish can replace other wish but still one wish and message touched me inside. I am sharing that  with you. It was the message from a student who silently admired but could never interact with me for she was reserve and shy.

I actually felt corners of my eyes were wet while reading this message from Manisha:


"Happy teachers day ma'am...!
aapko ek baat batati hu jo pehle main sirf apne frnds ke saath share karti thi. College ka 1st day 1st lecture mera aapke saath hi tha....And u were amazing....Aap mujhe bahut acchi lagi...Sab aapse baat karte the par main kafi shy thi to aapse kabhi personally baat nai ho paayi....

Surely aap mujhe nai recognise kar paaoge. jab aap aaidu se ja rahi thi to mujhe kafi bura laga tha.... 
Life me kai teachers ke saath interaction hua par aap sabse acche lage"

I could not say directly anything to her but in my heart I silently told her:

"Manisha I am really sorry that I am not able to recognize you exactly the way I recognize my students. Reading your message I am realizing that somewhere I too could not play my teacher's role effectively. Though I tired my level best to connect every student of my class, don't know how did I ignore you, though it was not at all intentional.I left Allahabad and you are conveying me today, but its never too late for reviving the connections. You told me that you are in Delhi, sure we will meet to rejuvenate good old days.Lots of love and blessings to you today and always !!"

Archana ~ 05-09-2013

Sunday, September 1, 2013

चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय.....!

चलो एक इतवार पुराना मनाया जाए,
गुज़रे बचपन को फिर से बुलाया जाए।

महाभारत का "समय" और मोगली का "जंगल",
"ये जो है ज़िन्दगी" का वही "खट्टा-मीठा' सफ़र ।
"नीम के पेड़" की छाँव में भागते "विक्रम-बेताल",
'सुरभी" से खिलती सुबह और 'चित्रहार" कमाल।

क्रूर सिंह की "यक्कू"  से कांपती 'चन्द्रकान्ता',
"पोटली बाबा की" और "चाणक्य" की दक्षता।
"ज़बान संभाल' के जाना ज़रा "नुक्कड़" पर,
"स्पेस सिटी सिग्मा" की है तुम पर नज़र।

सबकी सीडी-यों को एक-एक कर चलाया जाए
चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय।

नंदन, चम्पक, बिल्लू, पिंकी, चंदामामा,
नागराज, पराग और चाचा चौधरी का हंगामा।
कम्पुटर नहीं, कम्पुटर से तेज़ दिमाग को देखा था,
हमने बचपन में साबू से कमाल को देखा था।

जिसे जो कुछ मिले वो सब ले आना,
कुछ पलों के लिए बचपन से क्या शर्माना।
देखते ही सबकी बाछें  खिल जायेंगीं,
किताबों की वो अदला बदली याद बड़ी आएगी।

देखना कि  कुछ भी छूटने ना पाए।
चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय।

चलो एक इतवार पुराना मनाया जाय।

अर्चना ~ 01-09-013



Thursday, August 29, 2013

औपचारिकताएं

गुमनाम सी ज़िन्दगी
औपचारिक्ताओं में बंध गयी है...

ठहरे पानी में 
तरंग सी उठ जाती है 
जब यदा कदा 
बज उठती है 
सेल फ़ोन की घंटी  

और फिर वही 
मैं ठीक और आप ठीक... 
पर ख़तम हो जाते हैं वार्तालाप। 
प्रसंगहीन.... 
अर्थहीन....
भावहीन.....। 

ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में 
शांत होते शिथिल रिश्ते। 

अर्चना ~ 29-08-2013 

Wednesday, August 28, 2013

ज़िन्दगी रुकी नहीं है .....

ज़िन्दगी रुकी नहीं है,
और ना घड़ी  सुइयां ही....।

कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर,
मोहल्ले में सजी झांकी में,
अब कोई मुझे कृष्ण नहीं बनाता।
वो बात और है, कि बनना मैं
राधा ही चाहती थी, पर....
सोनी गोरी थी,  मैं सांवली
वो राधा बनी, और मेरे हाथों,
कृष्ण की बांसुरी ही लगी।

रसोई की स्लैप पे चढ़ के
छुप के लड्डू खाने पर
अब डांट भी नहीं पड़ती
ना लड्डू हैं और ना है
कोई डांटने वाला यहाँ
मुट्ठी में भरी  रेत सी
फिसलती.......
उन्मुक्त ज़िन्दगी।

पर चाँद आसमान में,
आज भी चलता है
मेरे भागते  क़दमों के साथ।

अर्चना ~ 28 - 08 - 20 13 

Saturday, August 17, 2013

किताबें कुछ कहना चाहती हैं : एक अनुभव

बचपन से ही किताबों ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है। मम्मी का भी बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा है किताबों के प्रति मेरे विशेष चाव में। जब से होश संभाला, खुद को चम्पक, नंदन, चंदामामा, पराग, सुमन-सौरभ, मधु-मुस्कान, और कादिम्बिनी इत्यादि से घिरा पाया।  वो बात और है की उस वक्त मन पाठ्यक्रम की किताबों में कम और नंदन, चंदाममामा में जयादा लगता था।

कभी परियों की दुनियाँ में खुद को खडा पाती, तो कभी विक्रम बेताल के पीछे पीछे भागती। तेनालीराम के किस्से और चाचा चौधरी की मूछें अभी भी चेहरे पर अनोखी मुस्कान  ला देते हैं। थोड़ा और बड़ी हुयी तो नंदन सुमन सौरभ से निकल कर, कादिम्बिनी भी पढने लगी, मम्मी के लिए आती थी वैसे पर मैं पढ़े बिना रह सकती थी भला ? कक्षा 6 से ही कादम्बिनी की कहानियों के सिरे खोजती रहती थी, और कविताओं की नीव और आधार , कुछ मिले और कुछ आज भी ढूंड रही हूँ।

बारहवीं कक्षा तक पढाई का माध्यम हिंदी ही रहा है, तो उस वक्त अंग्रेजी की किताबों की तरफ ना तो ध्यान ही गया और न ज़रुरत ही महसूस हुयी कभी। मम्मी का विषय भी हिंदी ही रहा है तो उनके माध्यम से भी हिंदी साहित्य की किताबों की ही तरफ ध्यान ज्यादा जाता था। मैं कक्षा 5 में रही होंगी जब मम्मी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से हिंदी में M.A. कर रहीं थीं, उनकी कबीर ग्रिन्थावाली मैंने तभी पढ़ डाली थी। कुछ दोहे तो अभी भी याद हैं।

स्कूल से आकर हमेशा यही उत्सुकता होती की क्या पता आज नयी नंदन या सुमन सौरभ आई हो, या कम से कम कादिम्बिनी तो ज़रूर। और अगर दिन बारिश का है तो हल्का पंखा चलकर, हलकी सी एक चादर भी ओढ़ कर नंदन का नया विशेषांक पढने में जो आनंद की अनुभूति होती थी, उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाउंगी कभी। Ayn Rand जोकि अब मुझे सबसे अधिक पसंद है वो भी उस कमी को पूरा नहीं कर सकती। सम्पूर्ण आनंद।

पड़ौस में  मेघा रहती थी, उसके पास नंदन सुमन-सौरभ तो नहीं पर किताबों का एक अगलग ही संसार था। रूस की लोक-कथाएँ, विज्ञान की परम्पराएं और भी ना जाने क्या क्या , हमारी पहुँच से एक दम बाहर की किताबें। रंग-बिरंगी, मोटी-पतली, छोटी-बड़ी किताबें। रूस की उन लोक कथाओं को पढ़कर मन एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाता था। रहन सहन, खाना पीना यहाँ तक ज़िन्दगी जीने का तरीका भी कितना अलग था हम लोगों से।मन तो जैसे, कैसे नए नए ताने बाने बुनने लगता था। कुछ पल के लिए तो लगता मैं रूस की गलियों में घूम रही हूँ।  मेघा से दोस्ती, मतलब किताबों का खजाना।

 मामा जी का घर भी पंतनगर में ही था।  अक्सर उनके घर रहने चली जाती थी और रहने जाने का एक बहुत बड़ा मकसद होता था "किताबें" :) कोमिक्स और किताबों की जो वैराईटी उनके घर मिलती थी वो हमारी कॉलोनी किसी बच्चे के घर नहीं मिल सकती थी। दिमाग पर जोर डालने से भी नाम याद नहीं आ पा  रहे उन सिरीज़ के जो उनके घर पढ़ी थीं, पर उन दिनों की यादें आज भी बाँछें खिला देती हैं।

उम्र बढती गयी और उम्र के साथ किताबों के प्रति रूचि बढ़ने के साथ बदली भी। ऐसा नहीं था कि बढती उम्र के साथ नंदन, चन्दामामा या सुमन सुरभि बुरे लगने लगे थे, पर अब सरिता और गृह शोभा पढने में भी मज़ा आने लगा था।  हालंकि सरिता और गृहशोभा हाथ में दिख जाए तो डांट पड़ना एक स्वाभिक प्रतिक्रिया थी, पर मैं किसी-न-किसी तरह हल  निकाल ही लिया करती थी। उत्सुकता और अभिरूचि उम्र और समय के साथ बढती ही हैं, यह उस समय पता तो नहीं था पर अनुभव ज़रूर किया था।

कॉलेज में कदम रखते ही अंग्रेजी की आवशकता महसूस हुयी और किबाओं के चयन में बदलाव की भी। पंतनगर यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी मतलब, खाली समय व्यतीत करने का मेरा प्रिय स्थान, उसमें से भी सबसे प्रिय जगह , इंग्लिश तथा हिंदी साहित्य और कविता सेक्शन। होस्टल के प्रांगण में शिडनी शेल्डन से भी मुलाकात हो चुकी थी अब तक। होस्टल की लड़कियों से मिलकर पता चला कि किताबों की दुनिया का एक कितना बड़ा हिस्सा अभी छुआ भी नहीं था और किताबों की बातें करना शुरू करो तो कभी ख़तम ही ना हों। ऐसा महसूस हुआ कि जैसे .....

किताबों के समुन्दर को दूर से देखा भर है , 
अभी तो बहुत ही लम्बा सफ़र है। 
एक बार ज़िन्दगी ख़तम हो जाए 
पर किताबों की दुनिया तो अमर है। ( अर्चना )

यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में ही बैठी थी की एक दिन नज़र पड़ी सफ़दर हाशमी साहब की इस कविता पर, जो आज भी मुझे मुंह ज़बानी याद है। पढ़ा तो ऐसा लगा कि जैसे किसी ने मेरे मन के भावों को उन सफ़ेद पन्नों पर अंकित कर दिया हो।  आप भी पढ़िए, शायद  ऐसा ही कुछ अनुभव आपका भी हो :- 

किताबें कुछ कहना चाहती हैं!


किताबें
करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की। 

आज की, कल की
एक एक, पल की
खुशियों की, ग़मों की 
फूलों की, बमों की 
जीत की, हार की 
प्यार की, मार की। 

क्या तुम नहीं सुनोगे 
इन किताबों की बातें ?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं 
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं। 

किताबों में चिड़ियाँ चहचहाती हैं 
किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं 
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं 
परियों के किस्से सुनाते हैं। 

किताबों में राकेट का राज़ है 
किताबों में साइंस की आवाज़ है 
किताबों का कितना बड़ा संसार है 
किताबों में ज्ञान का भण्डार है। 

क्या तुम इस संसार में 
नहीं जाना चाहोगे ?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं 
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

~ सफ़दर हाशमी ~ 



Saturday, August 10, 2013

The noise of the mute voices ... !!!



The noise of the mute voices inside,
not less than a hurricane or a tide. 
Confusing clarity,
of the unknown destination.
A moment of Cremation...!! 

Senses are seized silently,
Moments are frizzed quietly.
High intensity, 
of low frequency,
A silent move of emergency..!!


The noise that covers the soul, 
trapped with thoughts,slowly crawls.
 in blood streams and veins,
pouring down from eyes. 
like heavy Mumbai rains...!! 

Archana ~
10-08-2013

Saturday, July 20, 2013

भीगी भीगी सी है दिल्ली .... !!!


भीगी भीगी सी है दिल्ली ..... 


भीगी भीगी सी है दिल्ली
ऐसे मतवाले मौसम में
सोन चिरैया घर से निकली
कुछ अपनी ही धुन में भागे
बरखा की बूंदों में नाचे .......


चिड़िया मेरी छैल - छबीली
सर से पाँव तक है गीली....
न छाता ना  बरसाती है ..
मन ही मन वो भरमाती है
बस बारिश की लगन लगी है


मैं बोली ओ चिड़िया रानी
नहीं चलेगी अब मनमानी
बहुत हो गया अब घर आओ
पोंछो खुद को, सूख जाओ
गरमा-गरम पकोड़े खाओ :):)

 ~ अर्चना
20 - 07 -2013




Thursday, June 6, 2013

Switching of Pain....!!

It might be around 1pm. The Sun was on its peak and whole atmosphere was like a hot furnace. As usual I was sitting with two of my team members under the Peepal tree in-front of cancer hospital, AIIMS surrounded with patients. It was really getting hotter and we all decided to sit somewhere where its comparatively cooler. We got shifted near the main gate of IRCH(Indian Rotary Cancer Hospital-AIIMS) where they keep stature and wheel chairs for needy cancer patients. We were just settling down on our folding chairs, exactly then I saw a lean & thin old man was moaning on a stature few steps away from our chairs.

 I went there, asked him "What happened Baba ji?" He tried to say something in signs but I could not understand much. A weak, fragile, wounded and aching soul, breathing in almost a dead existence. Only thing covering lower part of his weak body was a thin checked cotton cloth, we often call Lungi. I looked around and asked if anybody is there with this Baba ji but nobody came forward. Some said that they were seeing him since 8.30am and he was there all alone for almost 5 hours. I was surprised that they were seeing him in this condition for 5 hours and still they were just seeing him.

 I do understand that everybody there, has their own cancer patients to look after but somewhere I feel it should make them more sensitive. May be their sensitivity was limited to sympathize from distance. Water in my bottle was almost finished, I looked around with demanding eyes and an old south Indian guard offered his bottle. I assumed myself, may be he needs water as his mouth was dry and he was sweating badly. With one hand I held his head and started poring water in his mouth. He drank but I was sure there was something more he wanted to convey. I felt a strong feeling of helplessness. My heart was full but I was holding on. He was again and again pointing out towards his thighs, and finally I could notice that urine bag attached to him was full and could be burst any time.

Now what to do???? Me and two of my team members were all puzzled as he had not even a single paper or thing with him to ensure his identity. If we go to the Doctor, what to say? which patient? what illness? I felt like taking a chance. I went to the room number 15, explained the situation to a Nurse in brief and she agreed to send somebody to at least empty his urine bag. I was a bit relieved but still puzzled. If we would take him to emergency, then too for enrollment we need identity of the patient. Our team decided to inform chief security officer of AIIMS so that he can inform Delhi Police about him and further action can be taken keeping his well-being in account.

We informed the security. And while I was bringing somebody to empty his urine bag, there appeared a young man of 22-23 years old claiming that the old man is his father. He told us that they are from Kolkata and today morning only came to AIIMS. His father is suffering from Multiple Myeloma( Cancer of Plasma cell ) and only two of them are in the family. The son was looking tired, and got anxious  because of the sudden flood of questions like "where was he since morning and why had he left the father alone?" etc. He was almost speechless. For a moment I felt he might collapse. I arranged some juice and biscuits for the son of the old man. Our team diverted the people around and we took the patient inside the corridor. Now major question was not where was the son since morning but what can we do for the moaning patient now?

Patient was very restless with high fever. He was again and again trying to say something in his own language with signs, which at least I was not able to comprehend. His son told he wanted to take a side. We all helped him to change side and we were shocked. Whole back and lower area was full of bed sores and was unbearably smelly. Now I could understand what Baba ji was asking me long before. Because of the bed sores he was not able to lie down on his back. Mean while one more senior member of our team joined us and her presence was a feeling of relief to all of us. She consulted a doctor over phone and decided to send the patient for primary medication first before admitting him in AIIMS, to that all of agree. My team arranged  the ambulance and send to a hospice for immediate pain relief and asked his son to come IRCH next day for systematic admission of his sick father.

Now, I was a bit relaxed and thought to call another patient's  mother to check the status. Cell phone was not in the pocket where usually I used to keep it in my hand-bag. I didn't get panic as now a days I am becoming forgetful. I checked in another pocket, then another and another, whole bag !! But cell phone was not there. I was still relaxed that may be one of my team members would have kept it, seeing that I was busy with Baba ji. They were smiling mischievously so I guessed they are playing with me.

Suddenly they all were serious as cell phone was not with them too. They dialed my number and it was switched off. Now my heart skipped so many heart beats all together. Just few moments before I was totally engrossed with that old moaning soul and now all I was worried about was my missing cell phone. I was worried about the thousands contacts I have lost, which I had collected over a long period of time and lost in few seconds. Mean while I have no idea when ambulance came and took the patient for primary care to hospice with the passionate support of my team members.

After an hour I got little settled and felt a strange feeling of guilt for sudden change of my feelings of pain from a moaning human being to loss of a non-living object. I was one of those selfish Human Beings, I was cursing few minutes back. Some time ago my eyes were filled with emotions for that old man and now my entire thought process was worried about the lost contacts.

I dropped few tears for identifying myself as another helpless selfish Human Being who could switch her feeling of pain from a human being to an object.

Archana
06.06.2013

Sunday, May 12, 2013

Cacophony of speechless Heart !

Those moments when words are not there but head aches with the inner sounds. So profound and intense, so noisy and tense. You cant comprehend, you cant understand, you just keep walking through them on the crowded street of thoughts. You try shutting your all senses, with all the weak strength left with-in you. Baseless, useless, helpless you, in the middle of the cacophony of speechless Heart !! 

Sunday, March 10, 2013

Being Responsible ~ Is it that difficult ?

I still remember 11th April 1990, when mummy took her last breath at 10.30pm. She was struggling with cancer since 1987. It was night so we had to wait till next day for the cremation ceremony and other rituals. My final exams of 8th class were due just after one week and we were instructed not to take any leave from school before that. It was a tough time though we already knew that Mummy din't have more days left with her. None of us could sleep that night. In the morning first thing I did was, wrote a leave application to the Principal of my school explaining that I won't be able to attend school for a week because of sudden demise of my mother.

There is a reason sharing the above incident as recently I have lost communication with 3 good friends of mine just because I expected them to take responsibility of their words & actions. We all have emergency situations where often we are not able to mean our words and actions but in today's technical world of smart phones, we all have various options to inform just by pressing few buttons or just by a click, isn't it?

Among all the three good friends of mine, one's action has left an irreversible feeling of guilt within me for rest of my life. It was November 2012. Nineteen year old Firoz was struggling with cancer and was admitted in AIIMS, Delhi for the surgery. Somehow Firoz and me used to share a special bonding & connectivity. It was he who was struggling with life and death but as a daily routine he used to call me just to check my well being. Even though I was on break from work for few months because of my ill health, I always used to help him through my friends living in Delhi, least I could do living so many kilometer away from him. His surgery was due in the last week of November. It was the same time when I got a call from Ajmer to conduct a training programme on Human Rights Education for government teachers of Rajasthan.

I reached Ajmer on 18th November and just after reaching got a call from Firoz. He wanted to meet me, may be there was something he was not able to communicate on phone. I was worried but helpless for I was committed to conduct the training programme that was starting from 19th November 2012. I called one of my very good friends in Delhi who had a sensitivity for cancer patients and often used to help them in whatever capacity he could. He agreed to meet Firoz on 19th evening and I got relaxed as I was almost sure that he would be able to substitute my presence and would look after Firoz in my absence.

After that I got busy with my Human Right training programme. I neither got any call from Firoz nor from that friend of mine till 23rd of November and I assumed everything is all right. On 23rd November Night I called my friend just to confirm if he met Firoz and if everything is all right there, His answer was " Oh Archana I couldn't meet him, because I got stuck with some work and there is some marriage in my family, lots of stuff....etc."  I said, "At least you should have informed." His reply was "I don't have only this work to do in life." I was speechless in shock as I never forced him to help my cancer patients, it was he who approached me to be associated with the cause out of his own choice and concern.

I got angry not because He din't meet Firoz but because he din't inform me that he won't be able to meet Firoz. I have so many other friends in Delhi who could have met Firoz if that friend was busy. I asked him to meet on 18th and it was 23rd night I got to know that he din't meet Firoz , almost 6 days. Its a big duration for a struggling cancer patient who was not able to communicate what he wants on phone to me.

I called Firoz and it was his sister who picked up the phone. She told Firoz's condition is serious and he is not able to communicate anything now. Within 5 days he got worst, On 25th I reached my home from Ajmer. On 26th morning I was getting ready to reach Delhi to meet Firoz and suddenly got a call from her father that Firoz was no more.

I was stunned and chocked with teary eyes. It was 6 hours run to Delhi from my place and they were taking Firoz to his village in Bihar for last rites. I was left with double guilt within me for not able to meet Firoz and not able to find out what he exactly wanted from me before leaving the world. Firoz was very much reserved with his family but was open to me and few friends of mine, the friend who promised to meet him was one of them. If he would have informed me timely that he din't meet Firoz as he promised, I would have asked another friend to meet Firoz but I couldn't make it as was in the impression that he had already met Firoz. It was just a matter of a pressing few buttons to text me taking few seconds out of his busy schedule but he didn't find it important.

The other two friends did something like that but repercussion was not that intense. Death is inevitable but the only thing that haunts me often is, that if I would have been timely informed, I would have known what exactly Firoz wanted to tell his Archana Didi. Now I am left with a guilt I can't explain, I can't bear and I can't ignore.

Heart aches when your so called very good friends who claim to be by your side forever, behave in such an irresponsible manner and show egoistic attitude just because you expected to be timely informed of their inability to perform the promised task.

I strongly feel in the hustle-bustle of living a fake life we are becoming an irresponsible machine who often ignore the importance of spoken words and commitments. I wonder why we say things when we don't mean them. We ask to call in 5 minutes/tomorrow/sunday but that 5 minute/tomorrow/sunday never comes. We insist to meet someone, take time, change plan in last minute but never bother to inform. What exactly is the reason for such an unorganized and irresponsible thought process?

When a small girl studying in 8th class can be responsible enough to write an application to the principal of her school about her mother's sudden demise sitting besides her dead existence, why can't grown up adults take the responsibility to mean their words and to inform if not able to.

Is it that difficult ?


Wednesday, February 27, 2013

"क्या हुआ दीदी ......"

दिन के करीब 3 बजे होंगे। एक दूसरे  से टकराते, हाथों और कन्धों पर सामन लादे, साथ में बच्चों की नन्ही उँगलियों को थामे लोग इधर से उधर दौड़ रहे थे। सबका गंतव्य अलग था पर धयेय एक ही था कि कहीं ट्रेन न छूट जाये।

शिथिल और बेजान से मेरे कदम भी भीड़ के धक्के से अपने आप ही आगे बढ़े जा रहे थे। उन  की तरह मुझे भी ट्रेन पकड़ने की जल्दी तो थी पर मन नहीं। जैसे जो था वो सब मेरे हर एक बढ़ते कदम के साथ पीछे छूटता जा रहा था। अपने आपको नियंत्रित व संयमित करने  की पूरी कोशिश कर रही थी पर हर प्रयास निरर्थक था।

फटा टूटा बेजान मन आँखों से बह रहा था और मैं कन्धों पर बैग को टाँगे, दोनों हाथों से आँखों को इस तरह पोंछने का अभिनय करते हुए आगे बढ़ रही थी कि जैसे इनमें कोई तिनका गिर गया हो। इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ कि इस अनजान भीड़ के सैलाब में दो नन्ही आँखें मेरी भीगी आँखों को भी देख रही हैं। 

काले बुरखे में सर से पाँव तक लिपटी वो तेरह- चौदह साल की मासूम लड़की कब मुझसे टकरा गयी मुझे पता भी न चला। अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को ऊपर उठाते हुए बोली  "क्या हुआ दीदी ......" एक क्षण के लिए मैं स्तब्ब्ध हो गयी कि  जैसे किसी ने मेरी चोरी पकड़ ली हो। बचपन में मम्मी से परियों की कहानियां तो सुनी थीं   पर यूँ अचानक सामने आ जायेगी, नहीं पता था। समझ ही नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ। "कुछ भी तो  नहीं …. " कह कर मैं तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गयी। 

आत्मीयता भरे शब्दों को सुन कर शान्ति से बहते आंसू अब हिचकियों में तब्दील होने लगे थे, पर उस नन्ही परी को मैं पीछे छोड़ आई थी, हालाँकि कहीं ना कहीं उसे यूँ छोड़ कर आने का पछतावा भी था। कदम रुके तो सीधे अपने कोच के सामने। दिन बीत गए, जिंदगी भी धीमी रफ़्तार से आगे  बढ़ने लगी पर आज भी अक्सर जब मेरी आँखें नम होती हैं तो ज़हन में काले लिबास में लिपटी वो लड़की चुपके से चली आती है और कहती है "क्या हुआ दीदी ……" और मैं भीगी पलकों से शून्य में खो जाती हूँ। 

अर्चना 
26-02-2013

Sunday, February 24, 2013

When a Relationship takes a Flight !! Part - II

When a relationship takes a flight you may find yourself in a self imposed darkness or end up in an enlightening clarity. You can see through the darkness, a beam of lonely-self. No matter how much you prepare yourself for the alarming farewell, you remain unprepared. A sudden repulsion from the immediate environment may lead to drifting from self or may leave you revolving around your drenched soul seeking for salvation from self. You are closely intact to your inner-self and start smiling through tears leaving behind all the apprehensions & fears.

A relationship you have nurtured with words, thoughts & dreams, a relationship you have fed with chocolates, coffees and ice-creams, a relationship you have decorated with magic moments, rains & cool breeze, a relationship you have bottled up in your blood, in your breath, in your self-esteem, a relationship that took you far away from your own-self, decides to take a flight in your respite.

All you want is to be as much weak as you can, as much motionless as you can, as much quiet as you can.You are in deep pain but you remain. Soul keeps melting through eyes, strength keeps moving from thighs but still you try to smile, for a while......... You got no option, you got no choice, you got no hope, you got no voice. Surrounded with the inner storm and turmoil, you decide to walk with elegance and node in acceptance. You don't stop it, you don't scold it, you don't possess it, you don't hold it. You give it wings of liberty, you hug it with modesty. Your heart screams, your soul denies, yet you kiss it Good Bye.

A relationship flies away and all you do is, keep watching it flying till it fades away from your sight with blank teary eyes.........

Archana ~
24-02-2013

Saturday, February 23, 2013

When a Relationship takes a flight !!

When a relationship
takes a flight.......

Darkness starts nourishing
the thoughts.......
with the water of
melting heart,
You are not sad
You are not angry
You have no time
but you are not in hurry !

When a relationship
takes a flight........

Soul starts questioning
the existence.....
in deep silent
and smoking voice,
You are not dead
You are not alive
You got no wings
But you want to fly !

When a relationship
takes a flight.........!!

Archana
18.02.2013

Tuesday, February 5, 2013

वो बच्चा ......!!

वो बच्चा....!
झाड़ू लगा रहा था..
नज़र टकरायी..
उसकी आँखों में,
धुंधली सी चमक आयी.
और मैं आगे बढ़ गयी.....
मतलबी और अभिमानी मन के साथ,
मेरे अपने भी दुःख हैं...
और अपनी समस्याएँ ...
किस - किस के बारे में सोचूंगी..
छोटी सी ज़िन्दगी  है...
मैं तो बस अपने लिए जियूंगी !!

अर्चना
5.02.2013

Saturday, February 2, 2013

Relations without Expectations?

I often see people coming forward with regular arguments on relationships and expectations. A common notion they come-up with is "A smooth relation survives with no expectations or least expectations." Somehow I always disagree with this concept of no expectations in relations.

 Why are people into any relationship if there is no expectation at first place ? Yes, we move with each other with certain degree of desire to satiate our physical or psychological needs or demands and if we are not meeting this purpose, there is no question of being with each other. Would we ever choose to be with someone just to be with someone by ignoring our senses? Will we happily accept the self denial? Don't we feel good if someone exactly understands our needs and demands and act accordingly? Is there anything wrong in feeling good and making others feel good? A strong need to have such question-answer sessions with an in-depth introspection and ensuring to place one's existence in a comfortable zone.

Relationships and Expectations go hand in hand. Those who claim to have a relation without expectations, live in an illusionary world of self denial. I feel Relationships without expectations are Dry Arrangements, that may sound decorative but lifeless.

Archana
2.2.2013