Saturday, August 9, 2014

परमिंदर का जन्मदिन .... !

आज 9 अगस्त है, परमिंदर का जन्मदिन। मैंने उसे सुबह से अभी तक शुभकामनाएं नहीं दी हैं। सोच रही थी उसको कुछ ऐसा तोहफा दूँ की वो चौंक जाये। काम की व्यस्तताओं ने कुछ ऐसा घेरा की कुछ नया नहीं कर पायी और सारा दिन यूँ ही निकल गया। कितने बड़े हो गये हैं अब हम, पहले एक दूसरे के लिये  सारे काम छोड़ दिया करते थे और अब काम के लिये एक दूसरे को भूल बैठे हैं। सोच कर एक पल को आत्मग्लानि होती है और दूसरे पल फिर वही व्यस्तता !

अब हमारी अभिव्यक्ति में वो बचपन वाली मासूमियत और समर्पण की भावना तो नहीं रही, जब की हम जन्मदिन के 10 दिन पहले से एक दुसरे के लिए ग्रीटिंग कार्ड्स बनाने बैठ जाते थे, अपनी पूरी तन्मयता और प्यार के साथ, लेकिन वो बचपन के मासूम तार आज भी हमें उतनी ही मजबूती से बांधे हुए हैं जितनी शिद्दत और प्यार से हमने अपने बचपन को सींचा था।

जब भी परमिंदर, मेरा, गोपाल या वजिंदर का जन्मदिन आता है तो मैं एक बार तो झा कॉलोनी वाले अपने घरों में जरूर ही पहुँच जाती हूँ जब हम अपनी छोटी सी दुनियाँ में अपनी तरह से, हमारा जन्मदिन मनाया करते थे। मम्मी नहीं थीं और परमिंदर की मम्मी काफी बीमार रहती थीं। हम दोनों की स्थिति लगभग एक जैसी थी। परमिंदर को तो लौकी की सब्जी काटना, आटा गूंदना भी आंटी के कहने से मैंने ही सिखाया था। दोनों हम उम्र थे पर मैंने हमेशा माँ का और परमिंदर ने बच्ची का रोल अदा किया था।

हम अपने जन्मदिन पर केक नहीं काटते थे, ना ही कॉलोनी के बच्चों को बुलाते थे। सुबह होते ही अपने हाथों से बना कार्ड और जेबख़र्ची से बचे पैसों से लाया गया तोहफा , जोकि बहुत ही जोड़-तोड़ के और दिमाग लगा के लाया जाता था, बर्थडे गर्ल को दिया जाता था। फिर हो जाती थी शुरू शाम की तैयारी।  मिठाई तो पापा लोग ले ही आते थे और हम बनाते थे शाम का मीनू। विदित ही है अर्चना शर्मा होतीं थीं हेड कुक और परमिंदर उनको असिस्ट करती थीं :) जो दो चार चीज़ें हमे बनानी आतीं थीं उन्ही को बड़े जोर शोर से बनाया जाता था।  घंटो रसोई में पसीने से लथ-पथ मैं और परमिंदर और हमारे अतिथि होते थे हमारे भाई , गोपाल और वजिंदर। कभी कभी पारुल और गुंजन भी आ जाते थे। पापा लोगों को तो हम उन्हीं कमरे सर्व कर देते थे।

हमारे खाने का मीनू, कुछ एक चीज़ों जैसे, छोले-भटूरे, ब्रेड रोल्स, साबूदाने की खिचड़ी, साबूदाने की टिक्की, बेसन के लड्डू, खीर या फिर छोले चावल तक ही सिमित होता था, पर उस वक़्त तो हम खुद को  किसी मास्टर शेफ से कम नहीं समझते थे। एक बार की बात है , परमिंदर का जन्मदिन था और हमारी सहेली पारुल को भी शाम को आना था। हमने शाम को साबूदाने की खिचड़ी और रायता बनाने का सोचा था। मैं तो साबूदाने की खिचड़ी बनाती रहती थी, पर परमिंदर ने कभी नहीं बनायीं थी। मैं ना जाने किस काम में व्यस्त थी, मैंने परमिंदर को साबूदाना भिगोने को बोल दिया और परमिंदर ने भिगो भी दिया। साबूदाने को बनाने के लिए कम से कम ३-४ घंटे पहले भिगोया जाता है। शाम को जब मैं साबूदाना बनाने चली तो भगोने से प्लेट हटाते ही मेरे होश उड़ गए।  भगोने में साबूदाना कहीं नज़र ही ना आये बस पानी ही पानी, साबूदाना नीचे था।  मेरा तो गुस्सा नाक पर , पारुल आने वाली थी। अब क्या किया जाय? परमिंदर डरी सहमी एक कोने में खड़ी थी , उसकी गलती नहीं थी।  उसे पता ही नहीं था की साबूदाना कैसे भिगोते हैं , उसे लगा जैसे चावल , दाल और छोलों को भिगोया जाता है वैसे ही साबूदाना भी भीगता होगा, दुगना-तिगना पानी डाल कर।  खैर अब कुछ नहीं हो सकता था , पारुल भी अब तक आ चुकी थी। मैंने किसी तरह पानी निथार कर उस साबूदाने को बनाया और हम सबने बड़े प्यार से उस लेही जैसे साबूदाने को खाया :)

इसी तरह परमिंदर के जन्मदिन का एक और किस्सा हम सबको आज भी हँसा देता है। हर बार की तरह हम अपने ही अंदाज़ में परमिंदर का जन्मदिन मना रहे थे। मैं, गोपाल, वजिंदर, परमिंदर, गुंजन और शायद नीरज भैया भी आ गए थे। हम किसी को इनविटेशन नहीं देते थे , बस जो भी आ जाए।  मेनू में इस बार छोले भटूरे थे। परमिंदर की पूरी कोशिश थी की उससे इस बार कोई गड-बड़ ना हो।  सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था।  मैंने भटूरों का आटा दोपहर को ही गूंद कर रख दिया था, परमिंदर ने छोले सुबह ही भिगो दिए थे।  शाम को छोलों को उबलने रख दिया गया और एक सीटी के बाद गैस खतम , लो कर लो बात ! खैर हम सबने मिल कर नया सलेंडर लगाने की कोशिश की पर असफल रहे।  हार कर हमने फैसला किया की सारा सामान मेरे घर शिफ्ट किया जाय और खाना वहीं बनाया जाय। गोपाल, वजिंदर, परमिंदर , हम सब मिल कर सारा सामान, मेरे घर ले आये।

मैंने परमिंदर को छोलों वाले कूकर को गैस पर रखने को कहा और हम सब कूलर में बैठ गप्पें मारने लगे।  परमिंदर भी कूकर को गैस पर रख कर हमारे पास आ कर बैठ गयी। बातों बातों में समय का पता ही ना चला, अचानक लगभग 45 मिनट्स के बाद मुझे याद आया की कूकर में सीटी तो अभी तक आई नहीं है, मैं झट से उठी रसोई की तरफ भागी और देख कर भोंचक्की रह गयी। कूकर गैस पर रक्खा था पर गैस जल नहीं रही थी। मैंने परमिंदर को आवाज़ लगायी पूछा , "तूने गैस नहीं जलायी थी क्या ?" परमिंदर का ज़वाब था "गुड़िया तूने कूकर को गैस पर रखने को कहा था , गैस जलाने को नहीं। " मैं अपने सर पर हाथ रख कर वहीं बैठ गयी  … ऐसी थी मेरी परमिंदर भोली और प्यारी , जो इतनी सी बात नहीं समझ पायी कि कूकर को गैस पर रखने के लिए कहते हैं तो इसका मतलब होता है गैस को जलाकर उस पर कूकर रखना :) कोई उससे पूछे भला , सारा सामन उसके घर से मेरे घर शिफ्ट करने का मतलब ही क्या अगर कच्चे छोलों से भरे कूकर को गैस पर बिना गैस जलाये रख दिया जाय  .... :)

खैर पहले परमिंदर ने मुझ से डाँट खायी और फिर हम सब खूब हँसे :) उस रात हमें खाना खाते खाते 12.30 बज गए। अब तो बस यादें रह गयीं हैं। इन बातों को भी 18-20 साल हो गए होंगे। समय तो जैसे पंख लगाये उड़ा ही चला जा रहा है। लेकिन मैं भी जिद्दी हूँ , एक-एक लम्हा आँखों में कैद कर रक्खा है, जब भी जी चाहता है भीगी आँखों से दोबारा जी लेती हूँ। सालों हो गए हैं एक दूसरे का जन्मदिन साथ मनाये , कच्चे छोलों के जायके के साथ भटूरे खाये  .... सालों हो गये एक दूसरे के लिये रसोई में पसीने बहाये  …… सालों हो गये एक दूसरे को गले लगाये  ……

प्रिय परमिंदर

उस पार है
उम्मीदों का आसमान
उजालों की मुस्कान
कल्पनाओं की उड़ान
और इस पार मैं
मेरी चमकतीं आँखें
उल्लसित मन
और ढेरों शुभकामनायें
तुम्हारी प्रगति और विकास के नाम
आशा और विश्वास के नाम
हर्ष और उल्लास के नाम
जन्मदिन की शुभकामनायें !

प्यार के साथ

अर्चना ~ 09-08-2014

Sunday, July 6, 2014

किरणों का अवकाश !

कभी कभी रात,
जनवरी से शुरू होती है
तो, ख़त्म होने का
नाम ही नहीं लेती।
किरणें शायद अवकाश पर हैं,
किन्तु
विस्मय की बात यह है कि
सूरज तो रोज़ निकलता है।
तेजहीन, ओजहीन,
चमकविहीन सूरज  …
रात के आँचल में
सहमा सा छिपा रहता है
ना उगने कि खबर मिलती है
ना छिपने का पता चलता है
और अब
आँखों को भी अँधेरे की
आदत हो गयी है  …
उजाले और रौशनी की बातें
कल्पना में रह गयीं हैं  ....  !


अर्चना ~ 06-07-2014




Saturday, June 28, 2014

अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं…।

अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं…।

स्कूल से लौटते वक़्त
मन में बस एक ही द्वंध होता था
कि आज किसकी चिट्ठी आई होगी?

मम्मी, पापा, गोपाल, जीज्जी
परमिंदर, वजिंदर, डॉली, अज्जी
गुंजन, बंटी, शालू, डोलू
प्रभुता, शालिनी, मनीषा आलोक
रूचि, रचना, अलका, गरिमा
छोटू, बेटू, अम्मा जी, पिता जी
आज भी मेरे
लोहे के छोटे बक्से में
भरे पड़े हैं सब.……
कुछ नाम  लिखने से रह भी गए होंगे,
बढ़ती उम्र की धुंधलाती यादें। …

नीले अन्तर्देशियों और पीले पोस्टकार्डों
की शाही ज़रूर हलकी पड़ गयी है
पर उनमें लिखा एक-एक शब्द
आज भी आँखों में हीरे सा चमकता है
कुछ सफ़ेद - पीले लिफ़ाफ़े भी हैं
अखबार सी चिट्ठियों से भरे.…

मैं जब भी अपने उस
चिट्ठियों के बक्से को
खोलकर बैठ जाती हूँ, तो
पापा अक्सर टोकते हैं,
"लाली! क्या ढूंढती रहती है,
इस बक्से  में ? ....... "
जवाब होता तो है , पर
शब्द नहीं  .......
ज़िन्दगी कितने आगे बढ़ गयी है
और मन रह गया है ,
वहीँ , पीछे कहीं  … ....

भागता दौड़ता वक़्त,
मौका मिलते ही जा पकड़ता है,
गुज़री यादों को,
सहजता से उमड़े,
मनोभावों को ....
हृदय द्रवित हो उठता है
और व्यथित भी …

एक ज़माना हो गया है
खाकी वर्दी में, साइकिल पे सवार
हैंडल पर थैला लटकाये उस
पसीने से लथ-पथ, थके माँदे
पर, मुस्कराते डाकिये को देखे  …
फेस-बुक के डिब्बे में बंद
स्मार्ट फ़ोन हाथ में लिए
हम आधुनिकता में खो गये हैं
खुद से बहुत दूर हो गये हैं
अब किसी को भी शायद
उस डाकिये की याद नहीं आती

मुझे आती है  …
डाकिये की भी और
मम्मी, पापा, गोपाल, जीज्जी
परमिंदर, वजिंदर, डॉली, अज्जी
गुंजन, बंटी, शालू, डोलू
प्रभुता, शालिनी, मनीषा आलोक
रूचि, रचना, अलका, गरिमा
छोटू, बेटू, अम्मा जी, पिता जी
और उन सभी की 
जिनको मैंने अपने छोटे से लोहे के
चिट्ठियों के बक्से में सहेज रखा है.... 

यादें उमड़ आती हैं
गला रुँध जाता है,
आँखें भीग जातीं हैं
पर … ....
अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं  …… !!

अर्चना ~ 28-06-2014



Friday, June 27, 2014

मैं सूरज ..... !!

सिर्फ तुम ही नहीं, 
मैं भी थकता हूँ... 
किरणों की तपती ज्वाला में,
सारा दिन मैं भी जलता हूँ...
किन्तु नियति के चक्रव्यूह में,
मुझको कोई अवकाश नहीं है।

अस्त यहाँ तो उदित वहाँ,
मेरे तन को विश्राम कहाँ....
मेरी व्यथा निहित मुझही में
मेरी कथा दृष्टित सृष्टि में
मैं सूरज दमकूँ कण कण में
उगूँ जहाँ प्रकाश वहीं है....! 


अर्चना ~ 27-06-2014 

Wednesday, June 18, 2014

माँ !

माँ ! तू मुझे रोक लेती है, 
गिरने से, थकने से, खोने से, 
आज भी रोक लिया... ... 
जब भी लगा कि नहीं है तू, 
मुझे गोदी में थामे खड़ी थी तू... ! 


अर्चना ~ 18-06-2014 

मैं सो जाऊँ, फिर उठूँ नहीं …।

मेरा लक्ष्य ना जीत कोई 
पा लूँ खुद को,मनमीत वही
सँकरे जीवन के भ्रमित जाल में
क्या क्या खोजूँ इस कोलाहल में 
बस एक आस, कोई चाह नहीं 
मैं सो जाऊँ, फिर उठूँ नहीं …। 
 

अर्चना ~ 18-06-2014 


इस रात की है, क्या प्रातः कोई ... ?


विचलित मन का 
आहत क्रंदन, 
कम्पित नभ,
तड़ित घन गर्जन।
मैं पिघलूँ,
बरसूँ अँखियों से,
सहमी सी,
निश्छल नदियों से। 
डगमग निश्चय,
ना आस कोई, 
इस रात की है, 
क्या प्रातः कोई ... ? 

अर्चना ~ 18-06-2014