Saturday, December 21, 2013

Do they care actually..... ?

When you get
a surprised attention,
a touch of concern
from those abusive
tongues and
indifferent eyes....

You get lost in
the blank spaces of horizon
They are the one
who walked away,
They are the one
who closed all the doors...

Then they appear
suddenly, calmly..
and leave you confused
with the baffled warmth
you ask yourself carefully...
Do they care actually.....?

Archana ~
21-12-2013

Monday, December 2, 2013

Trap...!!

A secure feeling 
of being insecure, 
Silence of a death 
in the noises around

Hearing own heart-beats 
and deaf to the world. 
Dancing on fortune
on clueless tune...
carelessly, fearlessly, aimlessly.

Passing moments, 
creating the emptiness,
Nothing more, 
nothing less.....

Everything is new, 
in the trap of old. 
A hot shattered life, 
experiencing the cold...... 

Archana ~ 02-12-2013 

Words ..... !!!

Words that were said.
Words that were framed.
Words that trapped your heart.
Words that were too smart.
Now left you empty, teared you apart.

Words then created mystic illusions.
Words now cleared all confusions.
Words then smoothed all the pain
Words now don't sound the same
Then bridged the gap, now a tight slap.

Words were then and words are now
Removing all the doubts, somehow......
Transition, transformation, sublimation
Creation, connection, destruction...
Words on move, striving high for Liberation.

Archana ~ 01-12-2013 

Tuesday, September 24, 2013

Mystery of Thoughts ....!!!

Skipping Heart Beats
Every passing moment
Chasing the Life....
Mysteries of aftermath
Capturing the Existence
in quest of Survival....

Far away........
Up in the sky
Dreams are resting,
on the clouds
Twinkling stars
singing the Lullaby...!!

Archana ~ 24-09-2013

उड़ान

मुझे उड़ने के लिए
 पंख नहीं,
उड़ान चाहिए

मेरे शब्दों को
एक नयी
पहचान चाहिए

उड़ान जो अभी
भरी नहीं
शब्द जो अभी
कहे नही

ऊँची नीची पगडंडियों
को नापता मन
तत्पर है उड़ने को

अनकहे शब्दों में
अनछुए सपनो में 

दिए की लौ से
सूरज की किरणों तक
कुलाचे खाती उड़ान।

अर्चना ~ 23-09-2013

Sunday, September 22, 2013

I Exist !!!




I exist in your silent words,
I exist in my noisy silence,
I exist in Earth and skies,
I exist in many brain files !

I exist, you are far or near,
I exist, its blurred or clear,
I exist, in my Presence,
I exist in your Absence !

I exist in Summer,Autumn,Spring & Rain,
I exist in Anxiety,Love,Joys & Pain,
I exist in tear drops resting on cheeks,
I exist in smiles wonderful and sleek ! 

I exist, you accept or deny,
I exist to touch the sky,
I exist, you care or ignore,
I exist to seek and explore ! 

I am the wind, I blow at my pace,
I exist, not to win the race,
I exist and I remain,
For I exist to sustain !!

Archana ~ 22-09-2013

Thursday, September 19, 2013

मम्मी की डायरी से ......



जिस वक़्त मम्मी की मृत्यु हुयी, उस वक़्त इतनी समझ नहीं थी की उनकी चीज़ों को ठीक से संभाल पाती। अब समझ आयी है तो काफ़ी कुछ पीछे छूट चुका है, फिर भी कुछ अवशेष हैं जो उनके आस पास होने का अहसास दिलाते हैं। जैसे कि उनकी ये लाल डायरी, जो डायरी कम और पिटारा ज्यादा है। भजन, नीति वचन, फ़ोन नम्बर्स, तरह तरह के पकवान,अचार और मुरब्बे  बनाने की विधियाँ, कवितायें, पते और भी न जाने क्या क्या.........।


जब मैं  हाई स्कूल में थी तो English Poetry की  जिस कविता  ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया था वह थी "IF" by "Rudyard Kipling". एक दिन मम्मी की डायरी उलटते-पलटते समय नज़र पड़ी एक कविता पर, ज़रा ध्यान दिया तो पाया यह कविता तो "IF" का हिंदी अनुवाद थी।  मेरी संवेदनशीलता तो मम्मी पर गयी है यह तो मुझे लगभग यकीन ही था पर मेरी कुछ साहित्यिक पसंद  मम्मी की पसंद से मेल खाती है यह जान कर मुझे एक विचित्र सी अनुभूति हुयी।

यह तो नहीं कह सकती कि "IF" का यह अनुवाद मम्मी ने ही किया होगा , हो सकता है उन्होंने किया हो और हो सकता है नहीं किया हो। मेरा इस सम्बन्ध में कुछ भी कह पाना मुश्किल होगा और अब उनकी अनुपस्थिति में पता भी नहीं लगाया जा सकता। पर आप सभी के साथ वह कविता बाँटना अवश्य चाहूँगी।
                                         

               यदि   

यदि संतुलन खो रहे हों सब जब, 
और दोष मढ़ रहे हों तुम पर, 
रख सको तब भी तुम अपने आपको संतुलित ;

यदि सब देख रहे हों जब संदेह दृष्टि से तुम्हें, 
विश्वास कर सको अपने पर तब भी तुम 
और दे सको सम्मान उनके संदेह को भी ; 

यदि कर सको प्रतीक्षा और कभी थको नहीं प्रतीक्षा से तुम,
अथवा फैलाया जा रहा हो जब झूठ तुम्हारे प्रति 
प्रवत्त न होओ तब भी तुम झूठ में ; 

यदि जब घृणा कर रहे हों सब तुमसे, 
दूर रख सको घृणा को हृदय से तब भी तुम,
और फिर भी न दिखो बहुत अच्छे, 
न बोलो बुद्धिमानों की भाषा ही; 

यदि स्वप्न तो लो तुम, 
स्वप्न से संचालित न होने दो निज जीवन को,
यदि आश्रय तो लो तुम विचार का, 
पर बनने  न पाए विचार तुम्हारा सर्वस्व; 

यदि भेंट हो तुम्हारी विजय और विनाश दोनों से, 
हो व्यवहार सम तुम्हारा परन्तु,
इन दोनों छलियों के प्रति; 

यदि तुम सहन कर सको उस सत्य को, 
जो किया जा रहा है पेश तोड़ मरोड़ कर तुम्हारे प्रति,
और जो बिछाया गया जाल है मूर्खों के लिए ;  

यदि वस्तुओं को तुम जिन्हें गढ़ा स्वयं तुमने अपने हाथों से, 
देख सको टूटा हुआ निज नेत्रों के सामने, और ,
जुट सको दोबारा नव निर्माण में नत मस्तक हुए ; 

यदि बना सको एक ढेरी, अपनी आज तक की सफलताओं की,
और दाव पर लगा सको उन्हें किसी एक सिद्धांत पर,
और हार जाओ सब कुछ पास था तुम्हारे जो कुछ भी, 
और कर सको प्रारंभ नए सिरे से अपने जीवन  को,
ना निकले आह एक भी अंतर से आघात पाकर ; 

यदि कर्त्तव्य के मार्ग पर अपने हृदय, नस, नाड़ी को, 
जब जवाब दे चुके हों वे, प्रवृत्त कर सको कर्म में, 
और तुम डटे रहो जब तक कि तुम में बचा न हो कुछ भी, 
सिवाय एक संकल्प के जो कहे तुम्हें "डटे रहो" ; 

यदि मिलो तुम भीड़ से और अडिग रहो निज सिद्धांत पर, 
यदि चलो तुम राजाओं के साथ, पर 
पृथक न करो सामान्य जन से अपने आप को; 

यदि शत्रु और प्रियजन आघात न पहुंचा सके तुम्हें, 
सब महत्वपूर्ण हों पर अति-महत्वपूर्ण न हो कोई तुम्हारे लिये;

यदि क्षमा का प्याला भर चूका हो जब 
संभाल सको कुछ पल के लिए अपने आपको, 
भूमंडल यह और यहाँ जो कुछ भी है तुम्हारा होगा, 

   और सबसे अधिक 

मेरे बच्चे ! इंसान बन जाओगे तुम, इंसान बन जाओगे तुम !!



~ मम्मी की डायरी से ( IF by Rudyard Kipling का हिंदी अनुवाद )