Sunday, March 29, 2015

पैसेंजर ट्रेन सी जिंदगी....

पैसेंजर ट्रेन सी जिंदगी
ना जाने और कितने
स्टेशनों से गुजरेगी 
रफ्तार थम गई है 
ट्रेन थक गई है 
धधकते कोयले 
धक्का देने को आमादा हैं
थकान का वजूद 
धुएं में उड़ रहा है 
ट्रेन का सिगनल 
दूसरे स्टेशन से 
जुड़ रहा है.....!

 ~ अर्चना 29-03-2015

Monday, February 9, 2015

प्यार..... !!

इज़हार करने का तरीका
बदल गया हो शायद...
अल्फाज़ भी
बदल गये हों शायद...
प्यार करने की तबीयत
प्यार करने की सीरत
प्यार करने की नीयत
प्यार करने की कहानी
प्यार करने की मनमानी
प्यार करने की रवानी
प्यार करने की रवायत
प्यार करने की नज़ाकत
प्यार करने की हिमाकत
अब भी पिछला
लिबास पहने हैं
प्यार करने वाले
बदल गये होंगे
प्यार के फलसफे
अब भी नहीं बदले हैं... 

~ अर्चना 
07-02-2015

Monday, December 1, 2014

A Lonely Soul



Reading the inevitable,
shines the History 
On the Land of Lakes, 
A Lonely Soul..... 
sketches her Faith.. ! 



~ Archana 
29-11-2014

Sunday, November 30, 2014

A Lonely Walk !


When throat gets chocked with flood of tears, you wonder your ability to breath. Your reservoir protects your abnormality from being more abnormal. It is not the struggle to breath or survive but a flawless effort to retain the self high. You have no idea the road leading you where and you have no intention to locate the destination. You have decided to walk and you walk, holding your own hands, clutching your own ribs. Every step you move ahead, you discover a stranger you never knew in you. Promises are fading away in the deep darkness of dark night. You wipe your eyes and you got a reason to smile for a while.




~ Archana 

30-11-2014 

Monday, November 10, 2014

साधना

पनप रही थी
खुद को साधने की धुन 
तुम्हारा साधना होना 
निश्चित था
तुमसे ही होके गुज़रते हैं 
मेरी माला के
मोतियों के मंत्र


 ~ अर्चना

Thursday, November 6, 2014

ज़िंदा हूँ .... !!

यादों से बाबस्ता हूँ
तो ज़िंदा हूँ
बीते पलों का रस्ता हूँ
तो ज़िंदा हूँ
बून्द-बून्द कर दरिया को 
भरा है मैंने आँखों में
लम्हा-लम्हा पलकों से
रिस्ता है तो ज़िंदा हूँ ........ !!!



 अर्चना
06-11-2014 

Wednesday, October 8, 2014

घुटन

किताबें जला कर
कुछ लोग कोशिश करते हैं
आक्रोश जलाने की
अंदर धधकती घुटन से
बाहर आने की
कि कुछ तो है जो परे है
इन किताबों के...
खून में तरबतर
कातिलाना अल्फाजों के
कि कुछ तो है जो
गला रुंधा देता है
बाहर आने की कोशिश में
धुआं धुआं जला देता है
राख में ढूंढते फिरते हैं
वो वज़ूद अपने किरदार का
किताबों को जलाकर
वो बन जाते हैं सिरा अखबार का..!

अर्चना ~ 08-10-2014